(अ) इमाम ह़सन मुज्तबा (अ़.स.) ने अपने मुनाज़ेरे में जो कि अ़म्री बिन उ़स्मान बिन अ़फ़्फ़ान, अ़म्रो बिन आ़स, उ़त्बा बिन अबू सुफ़ियान, वलीद बिन उ़क्बा और मुग़ीरा बिन शोअ़्बा के साथ मुआ़विया की मौजूदगी में हुआ। उन लोगों की बेहूदागोई और बकवास का जवाब दिया और उन्हें मह़कूम करने के बअ़्द मुग़ीरा बिन शोअ़्बा को ख़ेताब करते हुए फ़रमाया था:
“ऐ मुग़ीरा! तुम दुश्मने ख़ुदा-ओ-क़ुरआन हो और तुम ने रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) को झुठलाया और उन पर ईमान भी नहीं लाए। तुम वही शख़्स हो कि जिस ने ज़ेना किया और मुतक़्क़ी, आ़दिल और नेक लोगों ने तुम्हारी ज़ेनाकारी की गवाही दी, तुम्हें तो संगसार होना चाहिए था।
ऐ मुग़ीरा! तुम वही शख़्स हो कि जिसने ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ़.) दुख़्तरे रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) को मारा और उन्हें ज़ख़्मी किया और तुम्हारी इस ह़रकत से उनके रह़म में पल रहा बच्चा भी साक़ित हो गया और तुम्हारी इस करतूत का मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) की तौह़ीन, उनके फ़रमूदात की मुख़ालेफ़त नीज़ रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) और अह्लेबैते रसूल (स.अ़.व.आ.) की बेह़ुरमती के अ़लावा कुछ और नहीं था।”
(अल-एह़्तेजाज, जि.१, स.४१३-४१४)
(ब) ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ़.) के पोशीदा और मख़्फ़ी तौर पर दफ़्न और उनकी क़ब्र को पोशीदा रखने के वाक़ेआ़ को इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) ने भी अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) से नक़्ल किया है।
(अल-काफ़ी, जि.१, स.४५८, किताबुल ह़ुज्जा, बाब मौलेदिज़्ज़हरा, ह़.३)
इमाम ह़सन-ओ-इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) ने क्यों उ़मर के ज़रीए़ अपनी वालेदए गेरामी के क़त्ल की तरफ़ कोई इशारा नहीं किया?
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