इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी और ज़ेयारत से गुनाहों का बख़्शा जाना

पढ़ने का समय: 2 मिनट

इन्सान को अल्लाह की रह़मत पर उम्मीद रखनी चाहिए। अल्लाह ने क़ुरआन में वाज़ेह़ तौर पर कहा है: “अल्लाह की रह़मत से नाउम्मीद न हो” और ह़दीसों में भी आया है कि अल्लाह की रह़मत से नाउम्मीदी सबसे बड़े गुनाहों में शुमार होती है। इसलिए गुनाहगार और ख़ताकार होने के बावजूद, बन्दे को अल्लाह की रह़मत पर उम्मीद रखनी चाहिए। क़ुरआन में अल्लाह ने बार बार तौबा की तरफ़ रग़बत दिलाई और फ़रमाया है कि: “अल्लाह तमाम गुनाहों को मआ़फ़ कर देता है”। हम सब जानते हैं कि नेक अअ़्‌माल गुनाहों को मिटाते हैं जैसा कि अल्लाह ने क़ुरआन में कहा है: “नेकियाँ बुराईयों को दूर कर देती हैं”।
अगर किसी शख़्स को नेकी करने की तौफ़ीक़ मिले तो येह भी अल्लाह की तरफ़ से है: “मेरी तौफ़ीक़ अल्लाह के अ़लावा किसी से नहीं”। एक बेहतरीन नेकी जो गुनाहों को मिटाने का सबब बन सकती है, अह्लेबैत (अ़.स.) की ज़ेयारत और आ़शूरा के दिन मातम करना है क्योंकि रवायतों और ह़दीसों में आया है कि सैयदुश्शोहदा (अ़.स.) के लिए रोना और अह्लेबैत (अ़.स.) की क़ब्रों की ज़ेयारत गुनाहों को मिटाती है।
ह़ातिम ताई की कहानी में ज़िक्र है कि जब उन से पूछा गया कि क्या आप ने ख़ुद को सबसे ज़्यादा सख़ी देखा है, तो उन्होंने कहा: “हाँ, एक शख़्स जिसके पास सिर्फ़ एक बकरी थी और उसने रात को मेरी ख़ातिर उस बकरी को ज़ब्ह़ किया।” लोगों ने कहा: “आप ने उसके बदले किया किया?” उन्होंने कहा: “मैंने उसे पाँच सौ बकरियाँ तोह़्फे में दीं।” कहा गया: “तू ज़्यादा सख़ी है!” ह़ातिम ने कहा: “नहीं, क्योंकि उसने अपनी तमाम चीज़ें मेरे लिए दी (जो उसकी पूरी मिलकीयत एक बकरी थी) जब कि मैंने सिर्फ़ थोड़ी सी चीज़ दी।”
आ़शूरा की कहानी में, ह़ज़रत इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) ने जो कुछ भी उनके पास था, अपनी जान, माल और ख़ानदान की क़ुर्बानी दे दी। लेहाज़ा अल्लाह ज़ाएरीन और मातम करने वालों को बड़ा इन्आ़म देगा। लेकिन यक़ीनन, येह बख़्शिश और गुनाहों की मआ़फ़ी की उम्मीद रखना बअ़्‌ज़ शराएत के तह़त होती है। अफ़राद के ख़ुलूस नीयत, ह़ुस्ने ख़ुल्क़, तक़्वा और तौबा की मअ़्‌रेफ़त और मआ़फ़ी के क़बूल होने में मुअस्सर हैं। हम लोगों के अअ़्‌माल के क़बूल हो जाने या क़बूल न होने का फ़ैसला नहीं कर सकते और ह़क़ भी नहीं रखते हैं। इमाम सादिक़ (अ़.स.) ने फ़रमाया है कि हर मोअ्‌मिन दे दिल में दो नूर होते हैं, एक ख़ौफ़-ओ-हेरास और दूसरा उम्मीद-ओ-रजा, और येह दोनों मुकम्मल तौर पर हम वज़न होते हैं। अगर एक को वज़न करें तो दूसरे पर ज़्यादा नहीं होगा, और अगर दूसरे को वज़न करें तो पहले से ज़्यादा नहीं होगा। इसलिए, ज़ेयारत और मातम की क़बूलीयत की शर्त इन्सान के हाथ में नहीं, बल्कि क़बूलीयत सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ से है।

Be the first to comment

Leave a Reply