उम्मुल मोअ्‌मेनीन ख़दीजा (स.अ़.) से आ़एशा का ह़सद

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ह़ज़रत ख़दीजा (स.अ़.), रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) की पहली ज़ौजा होने के साथ साथ इस्लाम क़बूल करने वाली पहली ख़ातून भी हैं। आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) की निगाह में वोह एक अ़ज़ीमुश्शान मक़ाम और बलन्द मर्तबा रखने वाली ख़ातून हैं। आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) किसी भी औ़रत को ह़ज़रत ख़दीजा (स.अ़.) के हमपल्ला नहीं क़रार देते थे और हमेशा उनकी तअ़्‌रीफ़-ओ-तौसीफ़ फ़रमाते रहते थे। यही नहीं बल्कि उन्हें अपनी दूसरी तमाम अज़्वाज पर भी फ़ौक़ीयत देते थे। न सिर्फ़ जनाबे ख़दीजा (स.अ़.) बल्कि उनसे वाबस्ता हर फ़र्द की तअ़्‌ज़ीम के लिए आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) कोशाँ रहते थे।
रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.), ह़ज़रत ख़दीजा (स.अ़.) से इस क़द्र मोह़ब्बत और उनका इतना एह़्तेराम करते थे कि जब तक वोह ज़िन्दा रहीं, आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) ने दूसरी शादी नहीं की। ह़ज़रत ख़दीजा (स.अ़.) के बारे में रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) की क़द्र दानी सिर्फ़ ह़ज़रत ख़दीजा (स.अ़.) की ज़िन्दगी तक ही मह़्दूद नहीं थी बल्कि उनकी रेह़्लत के बअ़्‌द भी आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) उन्हें याद फ़रमाते थे और उनकी तअ़्‌रीफ़ और तकरीम फ़रमाते थे।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ़.व.आ.) ने फ़रमाया है:
اشْتَاقَتِ‏ الْجَنَّةُ إِلَى‏ أَرْبَعٍ‏ مِنَ‏ النِّسَاءِ- مَرْيَمَ بِنْتِ عِمْرَانَ وَ آسِيَةَ بِنْتِ مُزَاحِمٍ زَوْجَةِ فِرْعَوْنَ وَ هِيَ زَوْجَةُ النَّبِيِّ فِي الْجَنَّةِ وَ خَدِيجَةَ بِنْتِ خُوَيْلِدٍ زَوْجَةِ النَّبِيِّ فِي الدُّنْيَا وَ الْآخِرَةِ وَ فَاطِمَةَ بِنْتِ مُحَمَّد
“बेहिश्त चार औ़रतों की मुश्ताक़ है – मरियम बिन्ते इ़मरान, आसिया बिन्ते मज़ाहिम (फ़िरऔ़न की बीवी) कि बेहिश्त में पैग़म्बर की बीवी है, ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद कि दुनिया-ओ-आख़ेरत में रसूले ख़ुदा की बीवी और फ़ातेमा बिन्ते मोह़म्मद।”
(कश्फ़ुल ग़ुम्मा फ़ी मअ़्‌रेफ़तिल अइम्मा, जि.१, स.४६६)
किताबे सेह़ाह़ और मसानीद के मुतालेआ़ से येह ज़ाहिर हो जाता है कि आ़एशा को रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) की दूसरी बीवीयों से बहुत ज़्यादा ह़सद रहा करता था। “वाक़ेअ़्‌ मग़ाफ़ीर” इसकी खुली मिसाल है। इसी तरह़ जनाबे मारिया (वालेदाए इब्राहीम) के साथ जो उन्होंने किया उसका ज़िक्र तो क़ुरआन की तफ़ासीर में भी दर्ज है। इतना ही नहीं बल्कि आ़एशा को रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) की पहली ज़ौजा जनाबे ख़दीजा (स.अ़.) से बहुत ज़्यादा ह़सद रहा जबकि उन का पहले ही इन्तेक़ाल हो चुका था। किताब सह़ीह़ बुख़ारी किताब ७३ की एक रवायत में आ़एशा के जुम्ले मिलते हैं कि “मुझे रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) की किसी ज़ौजा से इतनी जलन नहीं हुई जितनी ख़दीजा (स.अ़.) से हुई हालाँकि मैंने उन्हें देखा भी नहीं था…।”
आ़एशा से मन्क़ूल एक और रवायत सह़ीह़ मुस्लिम में इस तरह़ है कि:
“रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) घर से बाहर नहीं निकलते थे मगर येह कि ख़दीजा (स.अ़.) को याद करते थे और उनकी तअ़्‌रीफ़ करते थे। एक दिन मेरे सब्र का पैमाना भर गया और मैंने कहा, वोह तो सिर्फ़ एक बुढ़िया थी और ख़ुदा ने उसके बदले में उससे बेहतर आप को दी हैं।
पैग़म्बर अकरम (स.अ़.व.आ.) इस तरह़ ग़ज़बनाक हुए कि आप (स.अ़.व.आ.) के सर के बाल ग़ुस्से की वजह से हिलने लगे, उसके बअ़्‌द फ़रमाया:
وَ اللَّهِ لَقَدْ آمَنَتْ‏ بِي‏ إِذْ كَفَرَ النَّاسُ‏ وَ آوَتْنِي إِذْ رَفَضَنِي النَّاسُ وَ صَدَّقَتْنِي إِذْ كَذَّبَنِي النَّاسُ وَ رُزِقَتْ مِنِّي الْوَلَدَ حَيْثُ حُرِمْتُمُوهُ قَالَتْ فَغَدَا وَ رَاحَ عَلَيَّ بِهَا شَهْر
ख़ुदा की क़सम, ख़ुदा ने मुझ को उससे बेहतर कोई औ़रत अ़ता नहीं की। वोह मुझ पर उस वक़्त ईमान र्लाइं जब लोग कुफ़्र एख़्तेयार किए हुए थे। उन्होंने मेरी उस वक़्त तस्दीक़ की जब लोग मुझ को झुठला रहे थे और उन्होंने अपने माल के ज़रीए़ मेरी उस वक़्त मदद की जब लोगों ने मुझे हर चीज़ से मह़्रूम कर दिया था और ख़ुदा ने सिर्फ़ उन्हीं के ज़रीए़ मुझे औलाद अ़ता फ़रमाई और मेरी किसी दूसरी बीवी के ज़रीए़ मुझे साह़ेबे औलाद नहीं किया।”
(मकातिबे रसूल, जि.३, स.६५५)
रसूले अकरम (स.अ़.व.आ.) के इस जवाब से आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) की ह़ज़रत ख़दीजा (स.अ़.) के लिए मोह़ब्बत और अ़क़ीदत-ओ-एह़्तेराम का अन्दाज़ा होता है। वहीं इस रवायत में आ़एशा का रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) के सामने उनकी चाहीती बीवी को बुढ़िया कहना आ़एशा के ह़सद का अन्दाज़ा कराता है जबकि उनको इस बात का बख़ूबी इ़ल्म था कि येह जुम्ला आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) की सख़्त नाराज़गी का सबब बनेगा। इस रवायत से येह ह़क़ीक़त भी ज़ाहिर हो जाती है कि जनाबे ख़दीजा (स.अ़.) ही रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) की सबसे अफ़ज़ल ज़ौजा हैं और कोई नही दूसरी बीवी उनके जैसी नहीं है।
पैग़म्बर अकरम (स.अ़.व.आ.) ने कभी भी जनाबे ख़दीजा (स.अ़.) को फ़रामोश नहीं किया और हमेशा उनके अख़्लाक़े ह़सना और उनकी ख़ूबियों को याद किया करते थे। और उन ख़वातिन के साथ भी ह़ुस्ने सुलूक करते थे जो जनाबे ख़दीजा (स.अ़.) की दोस्त थीं। एक और रवायत में आ़एशा का ही क़ौल है कि: “मुझे अज़्वाजे पैग़म्बर (स.अ़.व.आ.) में से किसी पर इतना ह़सद नहीं हुआ जितना ख़दीजा (स.अ़.) पर हुआ इसलिए कि पैग़म्बर (स.अ़.व.आ.) हमेशा उन्हें याद करते थे और अगर गोसफ़न्द ज़ब्ह़ करते थे तो ख़दीजा (स.अ़.) की दोस्तों के लिए भी भेजते थे।”
इस रवायत से आ़एशा कहती है:
“एक दिन एक बूढ़ी औ़रत रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) की ख़िदमत में आ गई, आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) ने उसका काफ़ी एह़्तेराम किया और उसके साथ मेहरबानी से पेश आए। जब येह बूढ़ी औ़रत चली गई, मैंने पैग़म्बर अकरम (स.अ़.व.आ.) से उस औ़रत के साथ मेहरबानी और लुत्फ़-ओ-करम से पेश आने की वजह पूछी?
रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) ने जवाब में फ़रमाया:
إِنَّهَا كَانَتْ‏ تَأْتِينَا زَمَنَ خَدِيجَةَ وَ إِنَّ حُسْنَ الْعَهْدِ مِنَ الْإِيمَان‏
येह बूढ़ी औ़रत उस ज़माने में हमारे घर आती थी जब ख़दीजा ज़िन्दा थीं और ख़दीजा की इमदाद और मेहरबानियों से सरशार होकर चली जाती थी, बेशक नेकियों और साबेक़ा अ़ह्द-ओ-पैमान की ह़ेफ़ाज़त करना ईमान की निशानी है।”
(कश्फ़ुल ग़ुम्मा फ़ी मअ़रेफ़तिल अइम्मा, जि.१, स.५०८)
रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) अपनी नूरे चश्म और जिगर गोशा जनाबे फ़ातेमा (स.अ़.) को निस्बते ख़दीजा (स.अ़.) की वजह से भी बहुत अ़ज़ीज़ रखते थे और शायद यही निस्बत एक वजह थी कि आ़एशा को जनाबे ख़दीजा (स.अ़.) की दुख़्तर जनाबे फ़ातेमा (स.अ़.) से भी नफ़रत रहा करती थी।

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