क्या क़ुरआन, फ़ासिक़-ओ-फ़ाजिर मुसलमान पर लअ़्‌नत करने से रोकता है?

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एक वीडियो क्लिप में एक वह़ाबी ख़तीब अपने मुरीदों को बता रहे थे कि यज़ीद पर लअ़्‌नत करना जाएज़ नहीं है। उनका कहना था कि भले ही यज़ीद फ़ासिक़-ओ-फ़ाजिर था मगर वोह कम अज़ कम मुसलमान था इसलिए उस पर लअ़्‌नत करना जाएज़ नहीं है।

क्या वाक़ेअ़न ऐसा है? आईये इसका जवाब क़ुरआन मजीद में ढ़ूँ़ढा जाए:

जवाब: येह जानना ज़रूरी है कि ‘लअ़्‌नत’ एक तरह़ की बद्दुआ़ है कि जिसमें लअ़्‌नत करने वाला ख़ुदा से येह दुआ़ करता है कि ‘मलऊ़न’ शख़्स को अपनी रह़मत से दूर रख। इस्लामी क़वानीन में मसअलए ‘लेआ़न’ इसी लअ़्‌नत से ह़ल किया जाता है। इसमें मुसलमान मर्द और उसकी मुसलमान ज़ौजा एक दूसरे को लअ़्‌नत का मुस्तह़क़ क़रार देते हैं। लेहाज़ा येह कहना कि मुसलमान भले ही फ़ासिक़-ओ-फ़ाजिर हो उस पर लअ़्‌नत नहीं की जा सकती, ग़लत है। इसी ज़िम्न में क़ुरआन की इस आयत को मिसाल के तौर पर पेश किया जा सकता है:

“और जो लोग अपनी बीवीयों पर ज़ेना की तोहमत लगाएँ और उनके पास ख़ुद उनके सिवा कोई गवाह न हो तो उनमें से एक शख़्स चार मर्तबा अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि वोह सच्चा है और पाँचवीं बार कहे कि अगर वोह झूठा है तो उस पर अल्लाह की लअ़्‌नत हो और औ़रत से सज़ा इस सूरत में टल सकती है कि वोह चार मर्तबा अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि येह शख़्स (उसका शोहर) झूठा है और पाँचवीं मर्तबा कहे कि मुझ पर अल्लाह का ग़ज़ब हो अगर वोह सच्चा है। अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़्ल और उसकी रह़मत न होती (तो तुम्हें उससे ख़लासी न मिलती) येह कि अल्लाह बड़ा तौबा को क़बूल करने वाला और ह़िकमत वाला है।”

(सूरह नूर, आयात ६-१०)

इस आयत से येह तो साबित हो गया कि क़ुरआन ने मुसलमानों पर लअ़्‌नत करने की इजाज़त दी है। क़ुरआन करीम में अल्लाह तबारक व तआ़ला ने मुतअ़द्दिद मक़ामात पर ख़ताकार और मुफ़सिद अश्ख़ास पर लअ़्‌नत की है। उनमें से चन्द एक को यहाँ पर बतौरे नमूना पेश कर रहे हैं:

فَهَلْ عَسَيْتُمْ إِنْ تَوَلَّيْتُمْ أَنْ تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ وَتُقَطِّعُوا أَرْحَامَكُمْ أُولَئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّهُ فَأَصَمَّهُمْ وَأَعْمَى أَبْصَارَهُمْ

“पस, तुम से येह बई़द नहीं कि तुम अगर साह़ेबे इक़्तेदार बन जाओ तो ज़मीन पर फ़साद बरपाँ करो और क़राबतदारों से क़तए़ तअ़ल्लुक़ कर लो। यही वोह लोग हैं जिन पर ख़ुदा ने लअ़्‌नत की है और उनके कानों को बहरा कर दिया है और आँखों को अन्धा बना दिया है।”

(सूरह मोह़म्मद, आयात २२-२३)

यज़ीद ने इस्लाम के मुक़द्दस तरीन शहरों में फ़साद बरपा किया। रेसालत मआब (स.अ़.व.आ.) के क़राबतदारों में उनके मर्दों को शहीद किया और उनकी औ़रतों को क़ैदी बनाया। यज़ीद से बढ़ कर इन आयतों का कोई मिस्दाक़ हो ही नहीं सकता। अह्ले तसन्नुन के बुज़र्ग आ़लिम इमाम अह़मद बिन ह़ंबल ने भी यज़ीद पर लअ़्‌नत करने के जवाज़ में इस आयत को पेश किया है:

الَّذِينَ يَنْقُضُونَ عَهْدَ اللَّهِ مِنْ بَعْدِ مِيثاقِهِ وَ يَقْطَعُونَ ما أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَنْ يُوصَلَ وَ يُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ أُولئِكَ لَهُمُ اللَّعْنَةُ وَ لَهُمْ سُوءُ الدَّارِ

“जिन लोगों ने अल्लाह से किए हुए अ़हद को तोड़ा और जिन अफ़राद से सिलए रह़मी करने का ह़ुक्म था उनसे क़तए़ रह़मी की और ज़मीन पर फ़साद बरपा किया उन्हीं लोगों पर लअ़्‌नत होती है और उनके लिए बहुत बुरा ठिकाना है।”

(सूरह रअ़्‌द, आयत २५)

इस आयत में भी ज़मीन पर फ़साद बरपा करने वालों पर लअ़्‌नत की जा रही है। इसके साथ साथ उन बातों का भी ज़िक्र है जो पहली आयत में मौजूद हैं। साथ ही उन लोगों में अ़हद शिकनी करने वालों को भी शामिल किया गया है। लेहाज़ा इस आयत में न सिर्फ़ यज़ीद बल्कि उसके बाप मुआ़विया को भी लअ़्‌नत का मुस्तह़क़ क़रार दिया गया है। मुआ़विया ने सुल्ह़े इमाम ह़सन (अ़.स.) में मौजूद तमाम अ़हद तोड़ दिया जिसमें एक अहम शर्त येह थी कि वोह अपने बअ़्‌द इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) को ख़ेलाफ़त सौंप देगा। मगर उसने मरते वक़्त अपने बेटे यज़ीद को मुसलमानों का ह़ाकिम बना दिया। इस तरह़ मुआ़विया की येह अ़हद शिकनी और ख़लीफ़ए बरह़क़ मौला अ़ली (अ़.स.) और इमाम ह़सन (अ़.स.) से जंग करना ज़मीन पर फ़साद बरपा करना है। इसलिए इस आयत में लअ़्‌नत की ज़द में मुआ़विया भी शामिल है।

وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا فَجَزَاؤُهُ جَهَنَّمُ خَالِدًا فِيهَا وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِ وَلَعَنَهُ وَأَعَدَّ لَهُ عَذَابًا عَظِيمًا

“जो किसी मोअ्‌मिन को जानबूझ कर क़त्ल करता है उसकी जज़ा जहन्नम है जिसमें वोह हमेशा रहेगा। उस पर अल्लाह का ग़ज़ब और अल्लाह की लअ़्‌नत बरसती रहती है और उसके लिए अ़ज़ीम अ़ज़ाब तैयार किया गया है।”

(सूरह निसा, आयत ९३)

नासेबी इस बात से भले ही इन्कार करें कि नवासए रसूल (स.अ़.व.आ.) के क़त्ल में यज़ीद शामिल न था मगर वोह येह तो क़बूल करते हैं कि उसके दौरे ह़ुकूमत में मदीना और मक्का में जो कई सौ अस्ह़ाब और ताबेई़न क़त्ल हुए हैं उन के ख़ून का ज़िम्मेदार यज़ीद ही है। इस वजह से भी वोह लअ़्‌नत का मुस्तह़क़ है।

अल ग़रज़ येह वहाबी और नासेबी जिस यज़ीद की ह़ेमायत में येह कह रहे हैं कि उस पर लअ़्‌नत न करो क्योंकि वोह मुसलमान था, इस बात को जान लें कि ख़ुद उसी के बाप मुआ़विया ने लअ़्‌नत का रेवाज क़ाएम किया था जो सत्तर साल तक चला। बनी उमय्या की ह़ुकूमत के ख़तीब हर जुमुआ़ के ख़ुत्बे में अमीरुल मोअ्‌मेनीन, ख़लीफ़ए रसूल, ह़ज़रत अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) पर (नऊ़ज़ोबिल्लाह) लअ़्‌नत करते थे। येह बात वाज़ेह़ है कि क़ुरआन की नज़र में यज़ीद मलऊ़न है, उसका बाप मुआ़विया भी मलऊ़न है और वोह तमाम अफ़राद भी मलाई़न हैं जो इन दोनों की ह़िमायत में अपना दीन ख़राब कर रहे हैं।

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