क्या अ़ज़ादारी में काले कपड़े पहनना (इसके मकरूह होने को नज़र में रखते हुए) जाएज़ है?

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पहला: हाँ, शेख़ सदूक़ (अ़.र.) ने अपनी किताब “मन ला यह़ज़ुरुहुल फ़क़ीह” में ह़दीस ७६७ के तह़त रवायत किया है कि अमीरुल मोअ्‌मेनीन (अ़.स.) ने अपने पैरूकारों से फ़रमाया:
“काले कपड़े न पहनो क्योंकि येह फ़िरऔ़न का लिबास है।”
और ह़दीस ७६८ में आया है:
“रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) काले लिबास को पसन्द नहीं करते थे सिवाय अ़मामा, अ़रबी जूतों और रेदा के।”

दूसरा: मज़्कूरा रवायात और दूसरी मुशाबेह रवायात की बुनियाद पर बअ़्‌ज़ सवाल करते हैं: क्या आ़शूरा और दीगर अईम्मए मअ़्‌सूमीन (अ़.स.) के अ़ज़ादारी के मौक़ेअ़्‌ पर काले कपड़े पहनना मुस्तह़ब है? और क्या येह अ़मल मशहूर फ़ुक़्हा के फ़त्वों के साथ टकराव नहीं है जो कहते हैं कि नमाज़ में काले कपड़े पहनना मकरूह है?
जवाब येह है कि फ़र्ज़ करें कि कुछ ह़ालात में काले कपड़े पहनना मकरूह है, लेकिन इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी में येह एक जुदा अ़मल है क्योंकि येह अ़मल ह़ुज़्न और अन्दोह के इज़्हार के लिए मुस्तह़ब है, क्योंकि काले कपड़े पहनना सद्रे इस्लाम से आज तक अह्लेबैत (अ़.स.) के ग़म के इज़्हार के मुताबिक़ और उनके तरीक़ों में शुमार होता है।

तीसरा: रवायात जो अह्लेबैत (अ़.स.) की तरफ़ से काले लिबास से परहेज़ के बारे में मिलती हैं, अगरचे सह़ीह़ और मुकम्मल हो, मगर येह काले लिबास को अइम्मए मअ़्‌सूमीन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी के लिए पहनने से मुतअ़ल्लिक़ नहीं हैं बल्कि येह ज़ालिमों और बनी अ़ब्बास की ह़ुकूमत के साथ मुतअ़ल्लिक़ हैं, जिन्होंने काले लिबास को अपना रस्मी लिबास क़रार दिया और मुसलमानों को पहनने पर मजबूर किया।

चौथा: मुह़क़्क़िक़ बह़रानी (अ़.र.) ने किताब “अल ह़दाएक़ुल नाज़ेरा” में कहा है कि नमाज़ में काले कपड़े पहनना मकरूह है, सिवाए अ़मामा, अ़रबी जूतें और रेदा के। रेदा एक लम्बा कपड़ा है जो ऊन का होता है और अ़बा भी उसमें शामिल है। लेकिन मेरे ख़याल में, काले लिबास को इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी में पहनने को मकरूह होने वाली रवायात से अलग किया जा सकता है, क्योंकि बहुत सी रवायात हैं जो अह्लेबैत (अ़.स.) के ग़म और अ़ज़ादारी की अ़लामत को ज़ाहिर करने की तरफ़ इशारा करती हैं। इस बात की तस्दीक़ एक रवायत से होती है जो अ़ल्लामा मजलिसी ने “मह़ासिने बरक़ी” से नक़्ल की है। उन्होंने इमाम ज़ैनुल आ़बेदीन (अ़.स.) के बेटे से रवायत नक़्ल की:
“जब मेरे मज़्लूम और शहीद जद ह़ुसैन (अ़.स.) को क़त्ल किया गया, बनी हाशिम की ख़वातीन ने अ़ज़ादारी में काला लिबास पहना और गर्मी और सर्दी में अपने कपड़े नहीं बदले और इमाम ज़ैनुल आ़बेदीन (अ़.स.) उनकी अ़ज़ादारी के मौक़ेअ़्‌ पर खाना तैयार करते थे।”

पाँचवाँ: शेख़ ह़ुर्रे आ़मेली (अ़.र.) ने किताब “वसाएलुश्शीआ़” में कहा है कि ह़सन बिन ज़रीफ़ बिन नासेह़ अपने वालिद से, ह़ुसैन बिन यज़ीद से, उ़मर बिन अ़ली बिन ह़ुसैन से नक़्ल करते हैं:
“जब ह़ुसैन बिन अ़ली (अ़.स.) शहीद हुए, बनी हाशिम की औ़रतों ने काला लिबास और अ़बा पहना और सर्दी और गर्मी की शिकायत न की, और अ़ली बिन ह़ुसैन (अ़.स.) उनकी अ़ज़ादारी के लिए खाना तैयार करते थे।”

छटाँ: किताब “बेह़ारुल अन्वार” में लिखा है:
“एक और रवायत के मुताबिक़ आ़शूरा के बअ़्‌द यज़ीद ने इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) के ख़ानदान से दिलजोई की। यज़ीद ने अह्ले ह़रम से पूछा कि आप किस रास्ते को अहम्मीयत देते हैं? क्या आप शाम में रहना पसन्द करेंगे और मुनासिब मक़ाम ह़ासिल करेंगे, या मदीना वापस जाना पसन्द करेंगे और क़ीमती तोह़फ़े ह़ासिल करेंगे? उन्होंने जवाब दिया: हम पहले ह़ुसैन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी करना चाहते हैं। यज़ीद ने कहा: जो चाहे करें। फिर उनके लिए एक घर मुहय्या किया गया और कोई भी हाशमी या क़ुरैशी औ़रत न रही, जिन्होंने ह़ुसैन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी के लिए काला लिबास न पहना हो यअ़्‌नी सबने पहना था। उन्होंने सात दिन तक अ़ज़ादारी की और आठवें दिन यज़ीद ने उन्हें तलब किया और ओ़हदा पेश किया, मगर उन्होंने उसे क़बूल करने से इन्कार किया और मदीना वापस जाने का फ़ैसला किया। यज़ीद ने उनके सफ़र के लिए सवारियों का इन्तेज़ाम किया और उन्हें तैयार किया।”

सातवाँ: किताब “वफ़यातुल अइम्मा” सफ़ह़ा ८५ पर अमीरुल मोअ्‌मेनीन (अ़.स.) की अ़ज़ादारी के बारे में आया है:
“ह़सन, ह़ुसैन और उनके भाई अपने वालिद की तदफ़ीन के बअ़्‌द वापस आए और घर में बैठ गए। इमाम ह़सन (अ़.स.) उस दिन घर से बाहर न निकले। अ़ब्दुल्लाह बिन अ़ब्बास, अ़ब्दुल मुत्तलिब के बेटे, लोगों के पास आए और कहा: अमीरुल मोअ्‌मेनीन वफ़ात पा गए और अल्लाह की रह़मत के क़रीब हो गए और उन्होंने एक जानशीन छोड़ा है जो अगर आप लोग चाहें तो उम्मत की क़यादत सँभाल सकता है और अगर आप नहीं चाहते तो हर शख़्स अपने काम पर जा सकता है। लोगों ने चीख़-ओ-पुकार और रोने की आवाज़ में ह़ज़रत को घर से बाहर आने की इल्तेजा की। इमाम, जो अपने वालिद की वफ़ात पर रोते हुए और काला लिबास पहने हुए थे, घर से बाहर आए, मिम्बर पर चढ़े, अल्लाह की ह़म्द-ओ-सना की, फिर रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) का ज़िक्र किया और सलाम-ओ-दुरूद भेजा। उन्होंने कहा: ऐ लोगों, अल्लाह से डरो और यक़ीन रखो कि आप के ह़ुक्मरान और इमाम, अह्लेबैत हैं जिनके बारे में अल्लाह ने फ़रमाया: अल्लाह चाहता है कि अह्लेबैत से रिज्स को दूर करे और उन्हें मुकम्मल पाकीज़गी अ़ता करे। ऐ लोगों, सच में, इस रात एक ऐसा शख़्स इन्तेक़ाल कर गया है जिसकी नज़ीर गुज़श्ता लोगों ने नहीं देखी और आइन्दा लोग भी उसके जैसा किसी को न देखेंगे। वोह वाक़ई़ रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) की तरफ़ से जेहाद करता था और अपनी जान को ख़ालिस दिल से उनके लिए पेश करता था। रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) उसे अपने अ़लम के साथ जंग में भेजते थे जबकि जिब्रईल र्दाइं तरफ़ और मीकाईल र्बाइं तरफ़ उसकी ह़िफ़ाज़त करते थे और वोह मैदाने जंग से वापस नहीं आता था जब तक कि अल्लाह फ़त्ह़-ओ-कामियाबी न अ़ता फ़रमाता।”

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