इमाम ज़ैनुल आ़बेदीन (अ़.स.) और एक नासेबी का मोह़िब्बे अह्लेबैत (अ़.स.) होना

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एक क़दीम कहावत है “जिसकी लाठी उसकी भैंस” और येह कहावत मअ़्‌रेकए कर्बला पर पूरी तरह़ से सादिक़ आती है। येह कब होता है, जब ह़ाकिमे वक़्त अपनी मन मानी करना चाहता है और जो कोई भी उसके रास्ते में आए उस बेदर्दी से कुचल देता है। जिस पर ज़ुल्म किया गया या जिसे क़त्ल किया गया उसकी शख़्सीयत के लेह़ाज़ से अगर ज़रूरत हो तो उसके ख़ेलाफ़ एक मोहिम, नश्र-ओ-इशाअ़त के ज़रीए़ शुरूअ़्‌ करता है ताकि अपने आप को सच्चा और मुख़ालिफ़ को झूठा साबित कर सके।

यज़ीद मलऊ़न ने भी इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) के क़त्ल को जाएज़ क़रार देने के लिए बिल्कुल यही अ़मल किया इस फ़र्क़ के साथ कि इस अ़मल में उसका बाप मुआ़विया इब्ने अबी सुफ़ियान भी उस वक़्त से शामिल था जिस वक़्त से उसने ह़ाकिमे शाम बनने में रद्द-ओ-बदल की जिसकी बेना पर बनी उमय्या इस्लाम के मुह़ाफ़िज़ और सरदार तसव्वुर किए गए जबकि बनी हाशिम जो ह़क़ीक़त में एलाही नुमाइन्दे थे, बाग़ी और काफ़िर (नऊ़ज़ोबिल्लाह) के तौर पर पेश किए गए।

मअ़्‌रेकए कर्बला के एख़्तेताम पर यज़ीद मलऊ़न येह समझा कि जंग पूरी हो गई है लेकिन इस बात को समझने में नाकाम रहा कि जंग अभी पूरी नहीं हुई थी बल्कि जंग जारी थी जिसका सबूत वोह सफ़र था जिसे इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) के ख़ानवादे को जिनमें बीमार मअ़्‌सूम बच्चे और मस्तूरात भी थीं, कर्बला से कूफ़ा और कूफ़ा से शाम तक तय फ़रमाना था।

इमाम ज़ैनुल आ़बेदीन (अ़.स.) के हाथों एक नासेबी का मोअ्‌मिन होना

यहाँ पर हमारी गुफ़्तुगू का मक़सद येह नहीं है कि इन गोशों को उभारा जाए मगर किस तरह़ उ़बैदुल्लाह इब्ने ज़ेयाद मलऊ़न और यज़ीद मलऊ़न को ज़लील होना पड़ा। हम तो सिर्फ़ एक दिलचस्प वाक़ेआ़ पर रोशनी डालना चाहते हैं जो उस वक़्त वुकूअ़्‌ पज़ीर हुआ जब इमाम सज्जाद (अ़.स.) ने, यज़ीद मलऊ़न के दरबार जाते हुए बाज़ारे शाम में एक नासेबी से गुफ़्तुगू की थी।

जब अह्ले ह़रम को असीर करके शाम में लाया गया और शाम की एक मस्जिद के क़रीब रोका गया, एक बूढ़ा शामी आगे बढ़ा और कहने लगा: शुक्र है उस ख़ुदा का जिसने तुम लोगों को हलाक किया और बग़ावत की आग को बुझाया (नऊ़ज़ोबिल्लाह)। अह्ले ह़रम को मुसलसल बेइ़ज़्ज़त करता रहा और उल्टी सीधी बातें कहता रहा।

इमाम: मैंने तुम्हारी बातें सुनी और जितनी भी बुग़्ज़-ओ-ह़सद और कीना का आग तुम्हारे दिल में थी उसको तुम ने उगल दिया। लेकिन इन्साफ़ की बात येह है कि जिस तरह़ से मैंने तुम्हारी बातें सुनी, तुम भी मेरी बात ग़ौर से सुनो।

शामी: जी फ़रमाए।

इमाम: क्या तू ने क़ुरआन पढ़ा है?

शामी: हाँ, पढ़ा है।

इमाम: क्या तू ने इस आयत को भी पढ़ा है?

قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ

“ऐ रसूले ख़ुदा! आप कह दीजिए कि मैं तुम लोगों से कोई अज्र नहीं चाहता हूँ सिवाए येह कि मेरे अह्लेबैत से मोह़ब्बत करो।”

(सूरह शूरा, आयत २३)

शामी: हाँ, पढ़ी है।

इमाम: वोह रसूले ख़ुदा के क़रीबी रिश्तेदार हम ही हैं। क्या तू ने क़ुरआन में उस ह़क़ के बारे में पढ़ा है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे बारे में है और दूसरे मुसलमानों का इससे कोई तअ़ल्लुक़ नहीं?

शामी: नहीं पæ़ढा।

इमाम: क्या तू ने येह आयत नहीं पढ़ी “और क़राबतदारों को उनका ह़क़ दे दीजिए।”

शामी: जी हाँ, पढ़ा।

इमाम: हम वही हैं जिनके बारे में अल्लाह ने अपने नबी को ह़ुक्म दिया, हमारे ह़ुक़ूक़ का ख़ास ख़याल रखें, उन्हें मोह़तरम जानें।

शामी: क्या आप वही लोग हैं?

इमाम : हाँ! क्या तू ने येह आयत नहीं पढ़ी?

وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُم مِّن شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّـهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَىٰ

“येह जान लो जो कुछ तुम्हें माले ग़नीमत मिले तो उस में से पाँचवाँ ह़िस्सा ख़ुदा, रसूल और क़राबत दारों का ह़क़ है।”

(सूरह अन्फ़ाल, आयत ४१)

शामी: हाँ, पæ़ढा है।

इमाम: वोह क़राबत दार हम ही हैं। क्या तू ने सूरह अह़ज़ाब की वोह आयत नहीं पढ़ी जो हमारे ह़क़ के बारे में है और दूसरें मुसलमानों से इसका कोई तअ़ल्लुक़ नहीं है?

शामी: नहीं।

इमाम: तू ने येह आयत नहीं पढ़ी?

إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّـهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا

“ख़ुदा ने येह इरादा कर लिया है कि ऐ अह्लेबैत! वोह तुम को हर क़िस्म की नजासत और पलीदगी से दूर रखे और इस तरह़ पाक-ओ-पाकीज़ा क़रार दे जो पाक-ओ-पाकीज़ा क़रार देने का ह़क़ है।”

(सूरह अह़ज़ाब, आयत ३३)

येह सुनना था कि बूढ़े शामी ने आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर तीन मर्तबा कहा:

“ख़ुदाया! मैंने तौबा की और मैं अह्लेबैत (अ़.स.) की दुश्मनी से भी तौबा करता हूँ। बारे एलाहा! मैं उन लोगों से बेज़ार हूँ कि जिन्होंने अह्लेबैत (अ़.स.) को क़त्ल किया। मैंने इससे पहले भी बारहा क़ुरआन पढ़ा था मगर ह़क़ाएक़े क़ुरआन से आश्ना न था।”

(अल एह़्तेजाज, शेख़ तबरसी, जि.२, स.३०७-३०८; बेहारुल अन्वार, अ़ल्लामा मजलिसी, जि.४५, स.१६६)

 

 

 

 

 

 

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