जब इमाम मोह़म्मद तक़ी (अ़.स.) ने जअ़्‌ली अह़ादीस को क़ुरआन की आयतों से रद्द कर दिया

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येह बात तमाम मुसलमान उ़लमा जानते हैं कि शीआ़ ह़ज़रात मौला अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) को रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) का ख़लीफ़ा बेला फ़स्ल मानते हैं। यही वजह है कि वोह सक़ीफ़ा की ह़ुकूमत के मुन्किर हैं और शेख़ैन को ग़ासेबाने ख़ेलाफ़त तसव्वुर करते हैं। इसके बरअ़क्स अह्ले तसन्नुन उ़लमा शेख़ैन की ख़ेलाफ़त को “ख़ेलाफ़ते राशेदा” तसव्वुर करते हैं। फिर इन दोनों की फ़ज़ीलत ज़ाहिर करने के लिए जअ़्‌ली अह़ादीस का सहारा लेते हैं जिनमें शेख़ैन की तअ़्‌रीफ़ों के पुल बाँधे गए हैं, चुनाँचे जब किसी शीआ़ को सरे आ़म घेरने की कोशिश की जाती है और अलग अलग ज़ावियों से शेख़ैन की बाबत उनसे सवालात पूछे जाते हैं तो बात बढ़ जाती है, होता येह है कि दौराने गुफ़्तुगू अगर कोई शीआ़ अपने अ़क़ीदे की बुनियाद पर शेख़ैन की फ़ज़ीलत का मुन्किर नज़र आए तो उस पर “राफ़ेज़ी” होने का इल्ज़ाम आ़एद कर दिया जाता है। ऐसा ही एक वाक़ेआ़ नवें इमाम जवादुल अइम्मा इमाम मोह़म्मद तक़ी (अ़.स.) के साथ पेश आया। मामून रशीद ने इमाम जवाद (अ़.स.) के इ़ल्म-ओ-फ़ेरासत से मरऊ़ब होकर अपनी बेटी उम्मुल फ़ज़्ल से उनकी शादी कर दी। येह बात मामून के ख़ानदान, बनी अ़ब्बास के बहुत से लोगों को नागवार गुज़री। उन लोगों ने इमाम जवाद (अ़.स.) (जो उस वक़्त ज़ाहेरन दस या बारह साल के थे) को इ़ल्मी मुनाज़ेरे में शिकस्त देने के लिए बसरा के एक बुज़ुर्ग आ़लिम और मुफ़्तीए अअ़्‌ज़म यह़्या बिन अक्सम को मामून के दरबार में तलब किया। एक रोज़ ख़लीफ़ा की मौजूदगी में जब इमाम जवाद (अ़.स.), यह़्या बिन अक्सम और दूसरे लोग बैठे हुए थे, यह़्या ने इमाम (अ़.स.) से कहा:
“रवायत हुई है कि जिब्रईल (अ़.स.), पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) की ख़िदमत में पहुँचे और कहा: या मोह़म्मद! ख़ुदा वन्दे आ़लम ने आप पर सलाम कहा है और कहा है कि मैं अबू बक्र से राज़ी हूँ, उससे पूछो क्या वोह भी मुझ से राज़ी है? इस ह़दीस के मुतअ़ल्लिक़ आप (अ़.स.) का क्या नज़रिया है?
इमाम (अ़.स.) ने फ़रमाया: जिस रावी ने येह ख़बर नक़्ल की है उसको दूसरी वोह ख़बर भी बयान करनी चाहिए थी जो पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) ने ह़ज्जतुल वेदाअ़्‌ में बयान की थी। पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) ने फ़रमाया था: जो भी मेरे ऊपर झूठी तोह्मत लगाएगा उसका ठिकाना जहन्नम होगा, लेहाज़ा अगर मेरी कोई ह़दीस तुम्हारे सामने पेश की जाए तो उसको किताबे ख़ुदा और मेरी सुन्नत से मिलाकर देखो, जो भी किताबे ख़ुदा और मेरी सुन्नत के मुताबिक़ हो उसको ले लो और जो कुछ किताबे ख़ुदा और मेरी सुन्नत के ख़ेलाफ़ हो उसको छोड़ दो। इमाम मोह़म्मद तक़ी (अ़.स.) ने मज़ीद फ़रमाया: (अबू बक्र के मुतअ़ल्लिक़) येह रवायत ख़ुदा की किताब से मुवाफ़ेक़त नहीं रखती क्योंकि ख़ुदा वन्दे आ़लम ने फ़रमाया है: हम ने इन्सान को ख़ल्क़ किया है और हम ही जानते हैं कि उसके दिल में क्या है और हम अपने बन्दे से उसकी शह रग से ज़्यादा नज़्दीक हैं (सूरह क़ाफ़, आयत १६)। क्या अबू बक्र की ख़ुशनूदी या नाराज़गी ख़ुदा के लिए पोशीदा थी कि वोह उसके बारे में पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) से पूछता? येह बात अ़क़्ली तौर पर मुह़ाल है।
यह़्या ने कहा: इस तरह़ भी रवायत हुई है: अबू बक्र और उ़मर ज़मीन पर इस तरह़ हैं जैसे आसमान पर जिब्रईल और मीकाईल हैं।
आप (अ़.स.) ने फ़रमाया: इस ह़दीस के मुतअ़ल्लिक़ भी ग़ौर-ओ-फ़िक्र से काम लो। जिब्रईल-ओ-मीकाईल ख़ुदा वन्दे आ़लम की बारगाह में मुक़र्रब दो फ़रिश्ते हैं और इन दोनों से कभी भी कोई गुनाह सरज़द नहीं हुआ है और येह दोनों एक लम्ह़ा के लिए भी ख़ुदा की एताअ़त के दाएरे से बाहर नहीं हुए हैं जब कि अबू बक्र और उ़मर एक अ़र्से तक मुशरिक थे, अगरचे ज़हूरे इस्लाम के बअ़्‌द मुसलमान कहलाए मगर उनकी बेश्तर उ़म्र ह़ालते शिर्क और बुत परस्ती में गुज़री है। इस बेना पर मुह़ाल है कि ख़ुदा वन्दे आ़लम इन दोनों को जिब्रईल और मीकाईल से तश्बीह दे।
यह़्या ने कहा: इसी तरह़ एक और रवायत हुई है कि अबू बक्र और उ़मर अह्ले बेहिश्त में बुढ़े लोगों के सरदार हैं। इस ह़दीस के मुतअ़ल्लिक़ आप क्या कहते हैं?
आप (अ़.स.) ने फ़रमाया: इस रवायत का सह़ीह़ होना भी मुह़ाल है क्योंकि तमाम अह्ले बेहिश्त जवान होंगे और उनके दरमियान कोई एक भी बूढ़ा नहीं होगा (ताकि अबू बक्र और उ़मर उनके सरदार बन सकें)। येह रवायत बनी उमय्या ने पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) की उस ह़दीस के मुक़ाबले में खड़ी की है जो इमाम ह़सन और इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) के मुतअ़ल्लिक़ बयान हुई है, नक़्ल हुआ है कि ह़सन-ओ-ह़ुसैन (अ़.स.) जवानाने जन्नत के सरदार हैं।
यह़्या ने कहा: येह भी एक रवायत नक़्ल हुई है कि उ़मर बिन ख़त्ताब अह्ले बेहिश्त के चिराग़ हैं।
आप (अ़.स.) ने फ़रमाया: येह भी मुह़ाल है क्योंकि बेहिश्त में ख़ुदा के मुक़र्रब फ़रिश्ते, अम्बिया (अ़.स.), जनाबे आदम (अ़.स.), आँह़ज़रत (स.अ़.व.आ.) और तमाम फ़रिश्ते मौजूद है फिर किस तरह़ मुमकिन है कि बेहिश्त उनके नूर से रोशन न हो लेकिन उ़मर के नूर से रोशन हो जाए?
यह़्या ने कहा: रवायत हुई है कि “सकीना” उ़मर की ज़बान से बोली हुई बातें हैं (यअ़्‌नी उ़मर जो कुछ कहते हैं वोह मलाएका और फ़रिश्तों की तरफ़ से है)।
इमाम (अ़.स.) ने फ़रमाया: …अबू बक्र जो कि उ़मर से अफ़ज़ल थे, मिम्बर के ऊपर कहते थे: मेरे पास एक शैतान है जो मुझे मुन्ह़रिफ़ कर देता है, लेहाज़ा तुम जब भी मुझे मुन्ह़रिफ़ होते हुए देखो तो मेरा हाथ पकड़ लेना।
यह़्या ने कहा: येह भी रवायत हुई है कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) ने फ़रमाया: अगर मैं नबूवत के लिए मब्ऊ़स न होता तो यक़ीनन उ़मर मब्ऊ़स होते।
इमाम (अ़.स.) ने फ़रमाया: यक़ीनन किताबे ख़ुदा (क़ुरआने करीम) इस ह़दीस से ज़्यादा सच्ची और सह़ीह़ है, ख़ुदा वन्दे आ़लम ने अपनी किताब में फ़रमाया है:
وَ اِذْ اَخَذْنَا مِنَ النَّـبِيّٖنَ مِيْثَاقَهُمْ وَ مِنْكَ وَمِنْ نُّوْحٍ وَّ اِبْرٰهِيْمَ وَ مُوْسٰى وَ عِيْسَى ابْنِ مَرْيَـمَ ۠ وَاَخَذْنَا مِنْهُمْ مِّيْثَاقًا غَلِيْظًا
“और उस वक़्त को याद कीजिए जब हम ने तमाम अम्बिया से, बिल ख़ुसूस आप से और नूह़, इब्राहीम, मूसा और ई़सा बिन मरयम से अ़ह्द लिया और सब से बहुत सख़्त क़िस्म का अ़ह्द लिया।”
(सूरह अह़ज़ाब, आयत ७)
इस आयत से वाज़ेह़ तौर पर मअ़्‌लूम हो रहा है कि ख़ुदा वन्दे आ़लम ने अम्बिया (अ़.स.) से अ़ह्द-ओ-पैमान लिया था फिर किस तरह़ मुमकिन है कि वोह अपने अ़ह्द-ओ-पैमान को बदल देता? अम्बिया (अ़.स.) में से किसी एक नबी ने ज़रा सी देर के लिए भी शिर्क एख़्तेयार नहीं किया, लेहाज़ा किस तरह़ मुमकिन है कि ख़ुदा वन्दे आ़लम ऐसे शख़्स को नबूवत के लिए मब्ऊ़स करे जिसकी उ़म्र का अक्सर-ओ-बेश्तर ह़िस्सा ख़ुदा के शिर्क में गुज़रा हो? नीज़ पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) ने फ़रमाया: जिस वक़्त आदम (अ़.स.) आब-ओ-गुल के दरमियान थे (यअ़्‌नी अभी ख़ल्क़ नहीं हुए थे), मैं उस वक़्त भी नबी था।
यह़्या ने फिर कहा: रवायत हुई है कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) ने फ़रमाया: कभी भी मुझ से वह़ी क़तअ़्‌ नहीं हुई और अगर क़तअ़्‌ हुई तो मुझे येह ख़याल आया कि वह़ी ख़त्ताब (उ़मर के बाप) के घर में मुन्तक़िल हो गई है। यअ़्‌नी नबूवत मेरे घर से उनके घर में मुन्तक़िल हो गई है।
आप (अ़.स.) ने फ़रमाया: येह भी मुह़ाल है क्योंकि मुमकिन नहीं है कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) अपनी नबूवत में शक करें। ख़ुदा वन्दे आ़लम फ़रमाता है:
“ख़ुदा फ़रिश्तों और इसी तरह़ इन्सानों के दरमियान से अम्बिया का इन्तेख़ाब करता है।”
(सूरह ह़ज, आयत ७५)
इस बेना पर ख़ुदा के इन्तेख़ाब के बअ़्‌द पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) के लिए कोई शक-ओ-शुब्ह बाक़ी नहीं रह जाता।
यह़्या ने कहा: रवायत में ज़िक्र हुआ है कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) ने फ़रमाया: अगर अ़ज़ाब नाज़िल होता तो उ़मर के अ़लावा किसी और को नजात न मिलती।
इमाम (अ़.स.) ने फ़रमाया: येह भी मुह़ाल है क्योंकि ख़ुदा वन्दे आ़लम ने पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) से फ़रमाया है:
“जब तक तुम उनके दरमियान हो उस वक़्त तक ख़ुदा उन पर अ़ज़ाब नहीं करेगा और जब तक येह इस्तेग़फ़ार करते रहेंगे उस वक़्त तक उन पर अ़ज़ाब नहीं होगा।”
(सूरह अन्फ़ाल, आयत ३३)
इस वजह से जब तक पैग़म्बरे अकरम (स.अ़.व.आ.) उन के दरमियान हैं और जब तक लोग इस्तेग़फ़ार करते रहेंगे, ख़ुदा उन पर अ़ज़ाब नाज़िल नहीं करेगा।”
(अ़ल्लामा तबरसी, एह़्तेजाज, जि.२, स.२४७-२४८; अ़ल्लामा मजलिसी, बेह़ारुल अनवार, जि.५०, स.८०-८३)
देखा आप ने कितनी ख़ूबसूरती से क़ुरआनी और अ़क़्ली दलाएल के ज़रीए़ इमाम मोह़म्मद तक़ी (अ़.स.) ने अपने मुक़ाबिल एक बुज़ुर्ग मुफ़्ती की तमाम रवायात को किनारे लगा दिया। येह एक तारीख़ी ह़क़ीक़त है कि बनी उमय्या के दौर में जअ़्‌ली अह़ादीस का एक कारोबार गर्म रहा और उसी ज़माने में अह्लेबैत (अ़.स.) की अ़ज़मत को कम करने के लिए शेख़ैन की फ़ज़ीलत से मुतअ़ल्लिक़ झूठी बातें उम्मत में आ़म की र्गइं। इसलिए इन तमाम अह़ादीस की जाँच पड़ताल होनी चाहिए।
इस सिलसिले में अ़ल्लामा मीर ह़ामीद ह़ुसैन हिन्दी की मोअ़्‌रकतुल आरा किताब “शारेक़ुन्नुसूस फ़ी तकज़ीबे फ़ज़ाएल” क़ाबिले मुतालेआ़ है।

 

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