माहे ज़िलह़िज्जा वोह महीना है जिसमें अल्लाह तबारक व तआ़ला ने अह्लेबैत (अ़.स.) को फ़ज़ीलतें अ़ता फ़रर्माइं और उनके दुश्मनों को ज़लील किया।
ह़ालाँकि अल्लाह ने अह्लेबैत (अ़.स.) को मुख़्तलिफ़ मवाक़ेअ़् पर फ़ज़ीलतें अ़ता फ़रर्माइं, हम ने देखा कि येह रुज्ह़ान माहे ज़िलह़िज्जा में और भी आगे बढ़ा। अल्लाह की नफ़रत, अह्लेबैत (अ़.स.) के दुश्मनों पर, आप के मुख़ालेफ़ीन पर और आप पर मुसल्लत होने वालों के लिए भी वाज़ेह़ है जिन्होंने अ़ली (अ़.स.) को अपनी ज़िद में चैलेन्ज किया।
दर्जे ज़ैल फ़ेहरिस्त में उन मवाक़ेअ़् को बयान किया गया है जिसमें अल्लाह ने अह्लेबैत (अ़.स.) को फ़ज़ीलत बख़्शी और आप के दुश्मनों को ज़लील किया। किताबों में वसीअ़् पैमाने पर दर्ज तरीख़ों को भी बयान किया जा रहा है।
एक ज़िलह़िज्जा – ह़ज़रत अमीरुल मोअ्मेनीन अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) का जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (स.अ़.) से निकाह़।
अल्लाह तबारक व तआ़ला ने जनाबे ज़हरा (स.अ़.) के लिए तमाम रिश्तों को ठुकरा दिया जिसमें अबू बक्र, उ़मर, अ़ब्दुर्रह़मान इब्ने औ़फ़ के रिश्तों की तज्वीज़ भी थी और अपने रसूल (स.अ़.व.आ.) को ह़ुक्म दिया कि आप का निकाह़ अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) से करें।
आप का निकाह़ दो हिजरी में जंगे बद्र के बअ़्द हुआ। कुछ अस्नाद की बेना पर निकाह़ छह ज़िलह़िज्जा को हुआ था।
(मफ़ातीह़ुल जेनान, एक ज़िलह़िज्जा के ज़ैल में शेख़ तूसी (अ़.र.) और शेख़ कफ़अ़मी (अ़.र.) से)
एक ज़िलह़िज्जा – जब अल्लाह ने अबू बक्र को हटाकर अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) को तब्लीग़ के लिए भेजा।
अल्लाह तबारक व तआ़ला ने रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) को ह़ुक्म दिया कि वोह अबू बक्र को वापस बुलाएँ और अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) को सूरह बराअत की तब्लीग़ के लिए भेजें, ९ हिजरी में।
- मनाक़िब अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.), जि.२, स.१४४
- अल ग़दीर, जि.६, स.३३७-३५०
- मुस्नदे अह़मद, जि.१, स.१५१; जि.३, स.२१२,२८३
- सुनने तिरमिज़ी, जि.३, स.३३९
- फ़त्ह़ुल बारी, जि.८, स.२३९-२४२
- ख़साएस, स.९१
- अल मुसन्निफ़, जि.७, स.५०६
दोनों वाक़ेआ़त (जनाबे ज़हरा (स.अ़.) का निकाह़ और सूरह बराअत की तब्लीग़) मुख़ालेफ़ीन पर अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) की फ़ज़ीलत को वाज़ेह़ तौर पर बयान कर रही हैं क्योंकि अल्लाह तबारक व तआ़ला ने ख़ुद ग़ैरों को अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) के मुक़ाबेल में रद्द कर दिया।
१० ज़िलह़िज्जा – ई़दुल अज़्ह़ा
दोनों ई़दें, ई़दुल फ़ित्र और ई़दुल अज़्ह़ा, दर ह़क़ीक़त अल्लाह की ह़ुज्जत के साथ जो कि आले मोह़म्मद (अ़.स.) हैं, सह़ीह़ तौर पर मनाई जा सकती है। मुसलमान इन दोनों में ह़ुज्जतहाए ख़ुदा की तरफ़ रुख़ करते हैं क्योंकि अल्लाह तबारक व तआ़ला ने आप के एह़्तेराम में इन दोनों को मुसलमानों के लिए मुकर्रम किया है।
इन ई़दों में ख़साएसे अह्लेबैत (अ़.स.) दो अहम अअ़्माल के ज़रीए़ ज़ाहिर होते हैं जिस का ह़ुक्म दिया गया है:
- इमामे ज़माना (अ़.स.) को तलब करने के लिए दुआ़ए नुदबा
- क़रीब या बई़द से ज़ियारते इमाम ह़ुसैन (अ़.स.)
जो कोई ई़दुल फ़ित्र या ई़दुल अज़्ह़ा के दिन इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) की ज़ियारत पढ़ें, गोया उसने अ़र्श पर अल्लाह की ज़ियारत की।
(मिस्बाह़ुज़्ज़ाएर, स.१७२)
२४ जिलह़िज्जा – आयते मुबाहेला का नुज़ूल
ई़साइयों से एह़्तेजाज के दौरान अल्लाह ने आले मोह़म्मद (अ़.स.) की ह़ेमायत में इस आयत को नाज़िल फ़रमाया:
“इ़ल्म के आ जाने के बअ़्द जो लोग तुम से कट ह़ुज्जती करें, उन से कह दीजिए कि आओ हम लोग अपने अपने फ़र्ज़न्द, अपनी अपनी औ़रतों और अपने अपने नफ़्सों को बुलाएँ और फिर ख़ुदा की बारगाह में दुआ़ करें और झूठों पर ख़ुदा की लअ़्नत क़रार दें।”
(सूरह आले इ़मरान, आयत ६१)
दोनों मकातिबे फ़िक्र के उ़लमा के मुताबिक़, इस आयत का मिस्दाक़ बनकर, अ़ली (अ़.स.), जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (स.अ़.), इमाम ह़सन (अ़.स.), इमाम ह़ुसैन (अ़.स.), रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) के साथ नजरान के ई़साइयों के मुक़ाबले के लिए गए थे।
(अल एह़्तेजाज, जि.२, स.३९२)
अह्ले तसन्नुन के ह़वाले:
- जामेउ़त्तिरमिज़ी, किताब ४७, ह़.३२६९
- जामेउ़ल बयान अल तबरी, (अह्ले सुन्नत) जि.३, स.२११-२१२
- तफ़सीरे इन्केशाफ़, जि.१, स.३६८-३६९
- तफ़सीर अल-कुर्तुबी, जि.४, स.१०४
- दुर्रुल मन्सूर, जि.२७, स.३९
- शवाहेदुत्तन्ज़ील, जि.१, स.१६५
पैग़म्बर (स.अ़.व.आ.) मुबाहेला में अस्ह़ाब को क्यों नहीं ले गए?
ह़ुज़ैफ़ा यमानी नक़्ल करते हैं:
“मैं मदीना में था, जब नजरान के दो पादरी, सई़द और आ़क़िब, रसूले अकरम (स.अ़.व.आ.) के पास आए और आप को मुबाहेला (लअ़्नत) के लिए ललकारा।
जब रसूले अकरम (स.अ़.व.आ.) मुबाहेले के लिए तैयार हो गए तो आ़क़िब ने सई़द को बताया: ऐ सई़द! अगर मोह़म्मद अपने अस्ह़ाब के साथ मुबाहेले के लिए आएँ, तो आप नबी नहीं हैं। लेकिन अगर आप अपनी आल के साथ मुबाहेले के लिए आएँगे तो ह़क़ीक़ी नबी और अल्लाह के रसूल हैं।”
(शवाहेदे तन्ज़ील, सूरह आले इ़मरान आयत ६१ के ज़ैल में)
२४ ज़िलह़िज्जा – आयते वेलायत का नुज़ूल (सूरह माएदा, आयत ५५)
इस दिन अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) ने अपनी अंगूठी ह़ालते नमाज़ में साएल को दी जिसकी तरफ़ अल्लाह तबारक व तआ़ला ने इस आयत में इशारा किया है।
“बस तुम्हारा वली अल्लाह है और उसका रसूल और वोह साह़ेबाने ईमान, जो नमाज़ क़ाएम करते हैं और ह़ालते रकूअ़् में ज़कात देते हैं।”
(मफ़ातीह़ुल जेनान, २४ ज़िलह़िज्जा की फ़ज़ीलत के ज़ैल में)
अह्ले तसन्नुन:
- तफ़सीरे क़ुरआनुल अ़ज़ीम इब्ने कसीर (इब्ने तैमिया का शागिर्द), सूरह माएदा, आयत ५५ के ज़ैल में
- दर्रुल मन्सूर, सूरह माएदा, आयत ५५ के ज़ैल में
- तफ़सीरुस्सअ़्लबी, सूरह माएदा, आयत ५५ के ज़ैल में
- शवहेदे तन्ज़ील, सूरह माएदा, आयत ५५ के ज़ैल में
- जामेउ़ल बयान, तफ़सीरे तबरी, सूरह माएदा, आयत ५५ के ज़ैल में
- अल नुरुल मुश्तल, अबू नई़म, स.७३
- मनाक़िबे अ़ली इब्ने अबी तालिब, इब्ने मर्दवैह, स.२३१
- तफ़सीरे मक़ातिल इब्ने सुलेमान, सूरह माएदा, आयत ५५ के ज़ैल में
२५ ज़िलह़िज्जा – आले मोह़म्मद (अ़.स.) की ह़ेमायत में सूरह दह्र (सूरह इन्सान) का नुज़ूल
इस दिन अल्लाह तबारक व तआ़ला ने अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.), जनाबे ज़हरा (स.अ़.), इमाम ह़सन (अ़.स.), और इमाम ह़ुसैन (अ़.स.), की शान में सूरह दह्र (७६) को नाज़िल किया। जब आप ह़ज़रात ने तीन दिन मुसलसल रोज़ा रखा और घर में मौजूद सामाने इफ़्तार, मिस्कीन, यतीम और असीर को दे दिया, दिन के आख़िर में अल्लाह तबारक व तआ़ला ने आले मोह़म्मद (अ़.स.) के लिए जन्नत के खानों का इन्तेज़ाम किया, जिससे आप ह़ज़रात ने इफ़्तार किया।
- मफ़ातीह़ुल जेनान, २५ ज़िलह़िज्जा के अअ़्माल के जैल में
- मिस्बाहुल मुतहज्जिद, जि.२, स.७१२
- मिस्बाहुल कफ़अ़मी, जि.२, स.६०१
- तफ़सीरुल बुरह़ान, सूरह दह्र के ज़ैल में
- ज़ादुल मआ़द, स .३०१
- बेह़ारुल अन्वार, जि.३५, स.२४२
- मनाक़िबे शहरे आशूब, जि.३, स.१०३
अह्ले तसन्नुन:
- तफ़सीरुल सअ़्लबी, जि.१०, स.१०१
- शवाहेदुत्तन्ज़ील, जि.२, स.४०३
- मनाक़िबे अ़ली बिन अबी तालिब, इब्ने मर्दवैह, स.३४१
- तफ़सीर अल-कुर्तुबी, जि.९, स.१३०
- अद्दर्रुल मन्सूर, जि.६, स.२९९
ज़िलह़िज्जा वोह महीना है, जिसमें अल्लाह ने अह्लेबैत (अ़.स.) को और ख़ास तौर से अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) को वोह मख़्सूस फ़ज़ाएल-ओ-करामत अ़ता फ़रमाएँ जो आप (अ़.स.) को दूसरे लोगों से जुदा करते हैं और ख़ास तौर से आप (अ़.स.) के एलाही मन्सब को ग़स्ब करने वालों से।

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