नफ़्से पैग़म्बर होने की बेना पर अ़ली (अ़.स.) सारी मख़्लूक़ात से अफ़ज़ल ह

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कुछ शुकूक पैदा करने वाले लोग शीओ़ं के इस नज़रिए से कि रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) के बअ़्‌द इमाम अ़ली (अ़.स.) अफ़ज़ल हैं तमाम मख़्लूक़ात से, और येह दअ़्‌वा करते हैं कि येह अ़क़ीदा कुफ़्र हैं और शीओ़ं के ख़ेलाफ़ कुफ़्र का फ़त्वा जारी करते हैं।
जवाब
इस तरह़ से शीओ़ं के ख़ेलाफ़ कुफ़्र का इल्ज़ाम कुछ नहीं है सिवाए क़ुरआन-ओ-सुन्नत से नावाक़ेफ़ीयत का इज़्हार है।
इन शुकूक पैदा करने वालों ने जो नतीज़ा अख़ज़ किया है, ख़ुद साख़्ता है जबकि येह जो उनका एअ़्‌तेराज़ है वोह ख़ुद क़ुरआन-ओ-सुन्नत की मुख़ालेफ़त करता है।
तमाम अइम्मा (अ़.स.) की अफ़ज़लीयत बिल ख़ुसूस ह़ज़रत अमीरुल मोअ्‌मेनीन (अ़.स.) की अफ़ज़लीयत तमाम अम्बिया (अ़.स.) पर सिवाए रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) के साफ़ ज़ाहिर है क़ुरआन की इस आयत से
क़ुरआन मजीद के मुफ़स्सेरीन की माबैन इत्तेफ़ाक़ राय है कि इस आयत में लफ़्ज़े “नफ़्स” से मुराद अमीरुल मोअ्‌मेनीन (अ़.स.) हैं।
अह़मद बिन ह़ंबल अपनी मुस्नद में रवायत करते हैं कि जब येह आयत नाज़िल हुई तो रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) ने ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.), ह़ज़रत फ़ातेमा (स.अ़.), ह़ज़रत इमाम ह़सन (अ़.स.), ह़ज़रत इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) को बुलाया और एअ़्‌लान कर दिया कि: ऐ परवरदिगार! येह मेरे अह्लेबैत हैं।
(मुस्नदे अह़मद बिन ह़ंबल,़ जि.१, स.१८५)
इस आयत में लफ़्ज़े नफ़्स के इस्तेअ़्‌माल से कोई येह नतीजा अख़ज़ कर सकता है कि अमीरुल मोअ्‌मेनीन (अ़.स.) की सेफ़ात रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) के साथ मुत्तसिफ़ हैं। और रवायतों में इज्मालन इस बात को पेश किया गया है कि नबीए अकरम (स.अ़.व.आ.) तमाम अम्बिया (अ़.स.) से अफ़ज़ल हैं, यहाँ तक कि इमाम अ़ली (अ़.स.) भी तमाम अम्बिया (अ़.स.) से अफ़ज़ल हैं।
सह़ीह़ बुख़ारी में नबीए अकरम (स.अ़.व.आ.) का एक बयान है जिसमें उन्होंने कहा है कि मैं तमाम मर्दों का सरदार हूँ।
(सह़ीह़ बुख़ारी, जि.४, स.२२३)
मैं आदम (अ़.स.) के बच्चों का सरदार हूँ।
(सह़ीह़ मुस्लिम, किताबे फ़ज़ीलत, तमाम मख़्लूक़ात पर हमारे नबी (स.अ़.व.आ.) की फ़ज़ीलत का बाब)
(सह़ीह़ तिरमिज़ी, जि. २, स.८९५)
इसी के मुताबिक़, येह एक रूह़ानी पहलू से साबित करता है कि ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.), नबी (स.अ़.व.आ.) के “नफ़्स”, तमाम मर्दों के सरदार और बनी आदम (अ़.स.) के सरदार भी हैं।
अ़ल्लामा ह़िल्ली (अ़.र.) ने किताब “शर्ह़े तजरीद” में ज़िक्र किया है:
इस मुबारक आयत में लफ़्ज़े “नफ़्स” ने इमाम अ़ली (अ़.स.) की तरफ़ इशारा किया है और येह कहना मुमकिन नहीं है कि ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) और नफ़्से रसूल (स.अ़.व.आ.) एक है। तो फिर सिर्फ़ एक ही पहलू अख़ज़ किया जा सकता है और वोह येह है कि रसूले अकरम (स.अ़.व.आ.) और ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) के दरमियान दर्जा बराबर का है। और फिर इस तरह़ इसमें कोई शक नहीं है कि रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) तमाम मख़्लूक़ात से अफ़ज़ल हैं तो यही तअ़्‌रीफ़ ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) के लिए भी आएगी।
(शर्ह़े तजरीद, स.२१८)
फ़ख़रुद्दीन राज़ी ने मुबाहेला की आयत पर तब्सेरा करते हुए कहा: वहाँ मह़मूद बिन ह़सन ह़मासी नामी एक शख़्स जो कि शहरे रै (जदीद दौर में तेहरान) का रहने वाला था और जो इस्ना अ़शरी शीओ़ं का उस्ताद भी था। उसका मानना है कि ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.), तमाम अम्बिया (अ़.स.) के मुक़ाबले में अअ़्‌ला हैं, सिवाए कि ह़ुज़ूर (स.अ़.व.आ.) के।
यहाँ उन्होंने कहा है कि: इस दअ़्‌वे की गवाही देने वाला अल्लाह का क़ौल है: “और मेरा नफ़स्‌ तुम्हारा नफ़्स” और “मेरा नफ़्स” यहाँ ह़ुज़ूरे अकरम (स.अ़.व.आ.) की तरफ़ इशारा नहीं कर रहा हैं क्योंकि कोई शख़्स अपने आप को कोई अ़मल करने का ह़ुक्म नहीं देता है।
बल्कि यहाँ “मेरा नफ़्स” ह़ुज़ूरे अकरम (स.अ़.व.आ.) के सिवाए किसी और के लिए है। और उ़लमा की माबैन इत्तेफ़ाक़ राय है कि यहाँ “मेरा नफ़्स” से मुराद ह़ज़रत अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) हैं।
इस तरह़ येह आयते मुबारका साबित करती है कि इमाम अ़ली (अ़.स.) का नफ़्स, रसूले अकरम (स.अ़.व.आ.) के नफ़्स के बराबर है न कि इमाम अ़ली (अ़.स.) का नफ़्स, ह़ुज़ूर (स.अ़.व.आ.) के नफ़्स की तरह़ है।
बल्कि आयत से मुराद येह है कि इमाम अ़ली (अ़.स.) का नफ़्स ह़ुज़ूर (स.अ़.व.आ.) के नफ़्स के बराबर है। तो फिर येह नतीजा अख़ज़ करना मुनासिब है कि इमाम अ़ली (अ़.स.) फ़ज़ाएल-ओ-कमालात के तमाम पहलूओं में ह़ुज़ूरे अकरम (स.अ़.व.आ.) के बराबर हैं।
इस आ़म (या आफ़ाक़ी) मसावात में सिर्फ़ ख़त्मे नबूवत वाह़िद इस्तिस्ना है क्योंकि येह इत्तेफ़ाक़े राय है और रवायतों में भी येह आया है कि ह़ुज़ूरे अकरम (स.अ़.व.आ.) के बअ़्‌द कोई और नबी नहीं होगा।
(तफ़सीर अल-कबीर, जि.८, स.८१, फ़ख़्रे राज़ी)
अगर कोई येह नतीजा अख़ज़ करता है कि “मेरा नफ़्स और तुम्हारा नफ़्स” क़ुरआनी आयत में ह़ज़रत अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) की कोई ख़ास फ़ज़ीलत की निशानदही नहीं करती हैं तो फिर हम नबीए करीम (स.अ़.व.आ.) की एक और क़ाबिले एअ़्‌तेमाद और मुतवातिर रवायत (तवासतूर) की तरफ़ तवज्जोह मब्ज़ूल कराते हैं जिसको ह़दीसे नूर के नाम से शोहरत ह़ासिल है जिसमें उन्होंने एअ़्‌लान किया: यक़ीनन अ़ली मुझ से है और मैं अ़ली से हूँ।
जैसा कि इस रवायत में इशारा किया गया है, क़ुरआनी आयत में लफ़्ज़ “मेरा नफ़्स” पैग़म्बर (स.अ़.व.आ.) और उन के नफ़्स अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) के माबैन फ़ज़ाएल में ह़क़ीक़ी मसावात ज़ाहिर करता है।

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