उम्मते मुस्लेमा में बरसों से जो अ़क़ाएद एक अल्मिया बने हुए हैं जिसके ज़ेरे असर आज तक तमाम मुसलमान हैं यअ़्नी अ़क़ीदए तौह़ीद, रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) का दीने इस्लाम में मर्तबा, शफ़ाअ़त, इन्तेख़ाब, अ़ली-ओ-फ़ातेमा (अ़.स.) और उनकी औलाद से मोह़ब्बत, इमाम ह़ुसैन (अ़.स.) का मर्तबा, यज़ीद की तनज़्ज़ुली, वग़ैरह, वग़ैरह।
वोह मिसालें जिस पर मुसलमान कुछ ह़द तक मुत्तह़िद थे लेकिन पिछले कुछ सालों से उनकी बेना पर गिरोहों के दरमियान तक़्सीम बन्दी बढ़ गई है।
मुआ़मेलात इस ह़द तक जा पहुँचे है कि जिस जमाअ़त ने इज्माअ़् की मुख़ालेफ़त की बæ़डी सितम ज़रीफ़ी के साथ उनकी मुख़ालेफ़त की गई उनके ज़रीए़ से जो इर्तेदाद से इत्तेफ़ाक़ रखते थे और मुश्रेकीन में से थे।
ऐसा ही एक मसअ़ला अमीरुल मोअ्मेनीन अ़ली इब्ने अबी ताबिल (अ़.स.) की मन्ज़ेलत का है। अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) की फ़ज़ीलत जिस पर मुसलमानों में मुकम्मल इत्तेफ़ाक़े राय पाया गया था उसे शकूक-ओ-शुब्हात से बदल के नीचे दबा दिया गया है। उन्होंने या तो मुकम्मल तौर पर ख़ूबियों का इन्कार किया है या उनके बर ख़ेलाफ़ दूसरों को इन ख़ूबियों से आरास्ता किया है।
मिसाल के तौर पर, क़ुरआनी आयत के नुज़ूल के बारे में:
وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَّشْرِيْ نَفْسَهُ ابْـتِغَاۗءَ مَرْضَاتِ اللّٰهِ ۭ وَاللّٰهُ رَءُوْفٌۢ بِالْعِبَادِ
“और लोगों में वोह भी हैं जो अपने नफ़्स को मर्ज़ीए परवरदिगार के लिए बेच डालते हैं और अल्लाह अपने बन्दों पर बड़ा मेहरबान है।”
(सूरह बक़रा, आयत २०७)
येह सुन्नी तफ़ासीर और रवायात की किताबों में कसरत से दर्ज है कि इस आयत से मुराद अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) हैं। जब हिजरत की रात जिसे लैलतुल मुबीत भी कहा जाता है रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) के बिस्तर पर सोने की बात आई तो आप (अ़.स.) ने ख़ुद की जान को ख़तरे में डाल कर रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) को बचाना क़ुबूल किया।
जबकि कुछ मुसलमानों का मानना है कि येह आयत शुऐ़ब बिन सेनान और दूसरे ज़ई़फ़ मुसलमानों के लिए है जो मदीना ह़िजरत कर गए।
दूसरे येह दअ़्वा करते हैं कि येह आयत आ़म तौर पर मुहाजेरीन की तरफ़ इशारा करती है सूरह तौबा की आयत नंबर १११ के ज़ैल में।
येह आयत भी अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) की तरफ़ मन्सूब है और अह्ले तशय्योअ़् के नज़्दीक येह कोई मुतनाज़ेअ़् बात नहीं है बहुत सुन्नी उ़लमाए केराम के नज़्दीक भी, अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) वोह शख़्स हैं जिसने अल्लाह की रेज़ा को ह़ासिल करने के लिए अपना नफ़्स बेचा।
लेहाज़ा दोनों फ़िर्क़ों के इज्माअ़् में आयत से मुराद अ़बी इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) हैं। दूसरों को भी इसका मिस्दाक़ क़रार देना इत्तेफ़ाक़े राय के ख़ेलाफ़ है और गुमराह करने की कोशिश है। अगर और कुछ नहीं तो, अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) लाज़ेमन वोह शख़्स हैं जो इस आयत के मिस्दाक़ हैं न कि उनको इसके मफ़हूम के सिरे से ख़ारिज किया जाए जो बहुत से शक्कियों ने करने की कोशिश की है।
ज़ैल में फ़ेहरिस्त में दिए गए सुन्नी उ़लमाए केराम जिन्होंने अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) की क़ुर्बानी ह़ुज़ूरे अकरम (स.अ़.व.आ.) के और इस्लाम के लिए है, का एअ़्तेराफ़ किया है इस आयत के उ़न्वान से।
इस आयत की तफ़सीर में सुन्नियों के मअ़्रूफ़ तर्जुमान, सअ़्लबी बयान करता है रवियों के अस्नाद के साथ कि:
जब ह़ुज़ूर (स.अ़.व.आ.) ने हिजरत का फ़ैसला किया तो आप (स.अ़.व.आ.) ने अमीरुल मोअ्मेनीन अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) को अपने क़र्ज़ों की अदाएगी और उसके सिपुर्दकर्दा अमानतों को वापस करने वाला मुक़र्रर किया। हिजरत के मौक़ेअ़् पर मुश्रेकीन ने उनके घर को चारों तरफ़ से घेरा हुआ था उस वक़्त आप (स.अ़.व.आ.) ने अमीरुल मोअ्मेनीन (अ़.स.) को ह़ुक्म दिया अपने बिस्तर पर सोने का और कहा कि सब्ज़ कम्बल से ख़ुद को ढ़ाँप लें।
उस वक़्त अल्लाह ने जिब्रईल और मीकाईल को वह़ी की और फ़रमाया: मैं तुम दोनों को इनका भाई क़रार देता हूँ और तूलानी उ़म्र अ़ता करता हूँ। अब तुम में से कौन तैयार है इन पर अपनी जान क़ुर्बान करने के लिए सब से पहले? दोनों में से किसी ने पहल न की।
उसने इन पर इन्केशाफ़ किया। अब अ़ली (अ़.स.), रसूलुल्लाह (स.अ़.व.आ.) के बिस्तर पर सोते हैं और उनके लिए अपनी जान क़ुर्बान करने को तैयार हैं। ज़मीन पर जाओ और उसके मुह़ाफ़िज़ बनो। जब जिब्रईल अ़ली (अ़.स.) के सर के क़रीब बैठे हुए थे और मीकाईल उनके पाँव के क़रीब बैठे हुए थे, जिब्रईल ने कहा: ऐ अबू तालिब के बेटे, आप को मुबारक हो। अल्लाह अपने फ़रिश्तों के क़रीब आप पर फ़ख़्र करता है इस मक़ाम पर।
इसी वजह से येह रात फ़रोख़्त होने वाली रात के नाम से मशहूर है।
(तफ़सीरे सअ़्लबी, जि.६, स.४७९)
१) कश्फ़ुल बयान, सअ़्लबी, जि.१, स.४०९
२) तफ़सीरे मफ़ातीह़ुल ग़ाबा (मशहूर बनामे तफ़सीरे कबीर), फ़ख़रुद्दीन राज़ी, जि.३, स.२२२
३) अल मुस्तदरक अ़लस्सह़ीह़ैन, जि.३, स.४
४) उसूदुल ग़ाबा फ़ी मआ़रिफ़िस्सह़ाबा, जि.४, स.२५
५) तफ़सीरे क़ुर्तुबी, जि.३, स.३४७
६) शवाहेदुत्तन्ज़ील, जि.१, स. १२३
७) मज्मउज़्ज़वाएद, हैसमी, जि.७, स.२७
८) ज़ख़ीरुल उ़क़्बा, मोह़ीयुद्दीन तबरी, स.८६, वग़ैरह
९) नूरुल अब्सार, शब्लन्जी, स.८४
१०) तफ़सीरे नेशापूरी, जि.२, स.८
११) तफ़सीरे अक़ामे ज़ैदी, जि.१, स.४१
१२) जामेऊ़त्ताएफ़ तफ़सीर, जि.५, स.२४१
१३) जवाहेरुल मतालिब, जि.१, स.२४१
१४) अस्सलातो ख़ैरूम्मिनन्नौम, जि.५, स.१३
१५) कूनूज़ुल ह़क़ाएक़, स.३१
१६) ग़ेयासुल मराम, स.३४४-३४५
१७) यनाबिल मवद्दा, जि.१, स.२७४
१८) किफ़ायतुत्तालिब फ़ी मनाक़िबे अ़ली बिन अबी तालिब, स.११४
जैसा कि फ़ेहरिस्त से ज़ाहिर है, सुन्नी उ़लमा सूरह बक़रा की २०७ वीं आयत पर मुत्तफ़िक़ हैं कि येह आयत अ़ली इब्ने अबी तालिब (अ़.स.) के लिए है। यही वोह वाह़िद शख़्स हैं जिनकी तरफ़ इसमें इशारा किया गया है। लेहाज़ा आप (अ़.स.) के बजाए दूसरों को इस आयत का मिस्दाक़ क़रार देने की कोशिश बुग़्ज़-ओ-ह़सद-ओ-कीना की तरफ़ इशारा करती है और आ़म मुसलमानों को अ़ली (अ़.स.) के बेशुमार फ़ज़ाएल के बारे में अन्धेरे में रखने के लिए की जाने वाली कोशिश कही जा सकती है।
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