(अ) क्या बनी हाशिम और बहुत से वोह लोग कि जिन्होंने सक़ीफ़ा और उस ज़माने के वाक़ेआ़त और ह़ादेसात पर एअ़्तेराज़ किया और ह़ज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स.अ़.) के घर में जमअ़् होकर अबू बक्र की बैअ़त से इन्कार किया, मदीना के बाशिन्दे नहीं थे?
(ब) क्या रसूले ख़ुदा (स.अ़.व.आ.) ने मदीना के लोगों के ह़क़-ओ-बातिल की शनाख़्त का मेअ़्यार बनाया था या ह़ज़रत अ़ली (अ़.स.) को?
अगर मदीना के लोगों का अ़मल और किरदार ह़क़-ओ-बातिल की शनाख़्त का मेअ़्यार है तो ख़लीफ़ए सिवुम का क़त्ल और उनकी बीवी नाएला( ) से पीछा छुड़ाना और उस पर एअ़्तेराज़ करना, ख़लीफ़ा के जनाज़े में शिर्कत न करना, मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न करने से मनअ़् करना, और ख़लीफ़ा के जनाज़े को यहूदियों के क़ब्रिस्तान मे दफ़्न करना और…. येह सब जाएज़ और मुबाह़ था?
और ख़लीफ़ा को क़त्ल करने वाले सिर्फ़ मुक़स्सिर और गुनाहगार ही नहीं है बल्कि जज़ाए एलाही के भी मुस्तह़क़ होंगे और उनकी क़द्रदानी और शुक्रिया भी अदा होना चाहिए इसलिए कि मदीना के लोग भी क़त्ले उ़स्मान के मौक़ेअ़् पर ख़ामोश रहे और कोई कारवाई नहीं की।
अगर मदीना के लोगों का अ़मल और किरदार ही ह़क़-ओ-बातिल की शनाख़्त को मेअ़्यार होगा तो इस सूरत में यज़ीद कि जिसने मदीना पर ह़मला किया और सह़ाबा का क़त्ल किया नीज़ मुसलमानों का क़त्ले आ़म और उनकी नामूस को मुबाह़ करना इस बात की दलील है कि यज़ीद न तो मुक़स्सिर है और न ही उसने किसी मअ़्सीयत का इर्तेकाब किया है इसलिए कि मदीना के लोगों ने यज़ीद के मुक़ाबले और उसकी मुख़ालेफ़त में कोई इक़दाम नहीं किया। (इस फ़िक़्रे के मुख़ातब वोह मुसलमान हैं जो अपने को अह्ले सुन्नत वल जमाअ़त कहते हैं जिनके नज़्दीक यज़ीद फ़ासिक़, फ़ाजिर और शराबख़ोर था)

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